ईसाइयों के मूल धर्म ग्रंथों के बारे में जानिए

ईसाइयों के मूल धर्म ग्रंथों के बारे में जानिए

ईसाइयों का मुख्य धर्म ग्रंथ बाइबिल है। बाइबिल का अर्थ है किताब।  बाइबिल वह है – जिसमें समय-समय पर अवतरित हुए मसीहा-पैगंबर की कथाएं हैं, उनके जीवन से जुड़ी कहानियां हैं और उनके द्वारा समय-समय पर दिए गए उपदेश, निर्देश और आदेश हैं। बाइबिल दुनिया में बहुत सम्मानित, वितरित और बहुपठित कृति है। ऐसा माना जाता है कि दुनिया में यह सबसे ज्यादा छपने वाली किताब है। ऐसा भी माना जाता है कि आज दुनिया में जितने लोग हैं, उससे भी ज्यादा बाइबिल की प्रतियां अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं।


आखिर कितने बाइबिल हैं?

दुनिया में 66 या 72  तरह के बाइबिल मिलते हैं, लेकिन मूलत: बाइबिल दो प्रकार के हैं –
१ – ओल्ड टेस्टामेंट मतलब पुराना धर्म-नियम
२ – न्यू टेस्टामेंट मतलब नया धर्म-नियम

ईसाई धर्म में दोनों प्रकार के बाइबिल पढ़े जाते हैं, लेकिन ज्यादा मान्यता न्यू टेस्टामेंट की है। ओल्ड टेस्टामेंट बाइबिल यहूदियों के काम का है। ओल्ड टेस्टामेंट बाइबिल भी कोई एक प्रकार का नहीं है, इसके तहत 39 या 45 बाइबिल हैं। न्यू टेस्टामेंट में 27 बाइबिल हैं। बाइबिल को लिखने वाले 44 से ज्यादा प्रमुख लेखक-संत हैं। पहले बाइबिल हीब्रू और अरामी भाषा में लिखी गयी थी, बाद में बाइबिल ग्रीक इत्यादि भाषाओं में लिखी जाने लगी। यह बात भी गौर करने की है कि दुनिया की 2000 से ज्यादा भाषाओं में बाइबिल का अनुवाद हो चुका है। कथन-शैली-अध्याय शृंखला हर बाइबिल में अलग-अलग मिलती है।


आखिर किसने लिखी बाइबिल?

पैगंबर या मसीहा मूसा (मोजेज) ने बाइबिल की शुरुआत की थी। ईसा पूर्व 1400 में मूसा ने बाइबिल संग्रह शुरू किया था – इसे ओल्ड टेस्टामेंट भी कहा जाता है। पैगंबर मूसा बोलते थे और उनके शिष्य संग्रहित करते थे, लिखते थे। धर्म की परंपरा मुख्य रूप से वाचिक ही थी। उस दौर में भी 1400 ईसा पूर्व से ईसा मसीह के अवतरण तक अनेक बाइबिल संग्रहित हो चुके थे। ईसा मसीह के अवतरण के बाद ईस्वी सन 50 से ईस्वी सन 100 के बीच बाइबिल की रचना पूरी हुई।
ईसा मसीह ने बाइबिल को नई दिशा प्रदान की, उनके बोले हुए, उनके किए हुए, उनके देखे हुए ज्ञान-कर्म को बाइबिल में जगह मिली। ईसा के शिष्यों ने बाइबिल को संग्रहित किया। ओल्ड टेस्टामेंट से अलग न्यू टेस्टामेंट दुनिया को मिला। न्यू टेस्टामेंट का प्रचार ही ईसाइयों ने पूरी दुनिया में किया। यहूदी आज न्यू टेस्टामेंट को नहीं मानते, वे ओल्ड टेस्टामेंट को ही मानते हैं। हम यह कह सकते हैं कि बाइबिल की रचना में पैगंबर मूसा और पैगंबर ईसा मसीह का बड़ा योगदान है। न्यू टेस्टामेंट बाइबिल में 5 बाइबिल ऐतिहासिक हैं और 21 बाइबिल शिक्षा प्रधान हैं। शिक्षा प्रधान बाइबिल में सर्वाधिक योगदान सेंट पॉल का है, इनमें सेंट पॉल के 14 पत्र शामिल हैं। हालांकि यह आशंका भी जताई जाती है कि ये पत्र सेंट पॉल के लिखे नहीं हैं, लेकिन इनकी पहचान सेंट पॉल के नाम से ही है।
बाइबिल केवल ईश्वरीय वाणी नहीं है, इसमें पैगंबरों-संतों-लेखकों ने भी अपने शब्द जोड़े हैं। बाइबिल में कुल 7,50,000 शब्द बताए जाते हैं। मूल बाइबिल हीब्रू, अरामी और ग्रीक में ही उपलब्ध है और आज भी उनके अनुवाद का क्रम चल रहा है। अनेक भाषाओं में बाइबिल आज भी अनुवादित की जा रही है, लिखी जा रही है, उसमें आज भी सुधार हो रहा है। ईसाई संत-विद्वान आज भी व्याख्या करते हैं और सुंदर से सुंदर बाइबिल दुनिया को देने की कोशिश करते हैं।

पुराने बाइबिल और नए बाइबिल में अंतर

पुराने बाइबिल अर्थात ओल्ड टेस्टामेंट में कड़ाई की बातें हैं, वहां दया-मोह माया कम है। यहूदी परंपरा ओल्ड टेस्टामेंट को मानती है, जिसमें आंख के बदले आंख लेने की ओर इशारा है, लेकिन न्यू टेस्टामेंट में ईसा मसीह का पूरा प्रभाव दिखता है, जहां वे कड़ाई की धारा छोड़ देते हैं और कहते हैं कि अगर कोई आपके एक गाल पर थप्पड़ मारे, तो दूसरा गाल आगे कर दो। ये ईसा मसीह ही थे, जिन्हें जब यहूदियों ने सूली पर चढ़ा दिया, तब उनके मुंह से यही निकला कि हे ईश्वर इन्हें क्षमा करना, इन्हें पता नहीं है कि ये क्या कर रहे हैं।
न्यू टेस्टामेंट को उदार माना जाता है, इसलिए हम देखते हैं कि उसके दुनिया में अवतरण के बाद ईसाइयों की संख्या तेजी से बढ़ी। बाइबिल का न्यू टेस्टामेंट शुरुआती दौर में उन लोगों को समझ में नहीं आया, जो ओल्ड टेस्टामेंट को मानते थे। न्यू टेस्टामेंट को मानने वाले संत-विद्वान बड़ी संख्या में मारे गए। इन लोगों ने अपनी नई बाइबिल को लेकर खूब संघर्ष किया और बर्बर यूरोप को दया-प्रेम का मार्ग दिखाया। ईसा मसीह जीते जी जो काम न कर सके, उन्होंने सूली पर चढक़र शहीद होकर दुनिया में वह काम कर दिया कि दुनिया उन्हें कभी भूल नहीं सकती। आज ईसा मसीह के कारण ही बाइबिल को ऊंचाई हासिल है। ईसा मसीह का प्रभाव अनेक महापुरुषों पर पड़ा।

बौद्ध धर्म और नई बाइबिल

येरूशलम के आसपास के क्षेत्र में ईसा मसीह के समय इस्लाम का वर्तमान रूप प्रकट नहीं हुआ था, पैगंबर मोहम्मद का अवतरण नहीं हुआ था, लेकिन ईसा मसीह के दौर में भारत में बौद्ध धर्म चरम पर था। जो यज्ञ का विरोधी था, जो धार्मिक कर्मकाण्डों का विरोधी थी, जो दया-अहिंसा पर जोर देता था। तब अरब देशों में यहूदियों का बड़ा प्रभाव था, वे मूर्ति पूजक और कर्मकांडी थे। अपने विचारों में कट्टर या प्रखर भी थे, उस दौर में ईसा मसीह का अवतरण हुआ। बहुत से विद्वान ईसा मसीह पर बौद्ध धर्म का असर मानते हैं। जिस तरह की अहिंसा की बात ईसा मसीह ने की, उसी तरह की बात गौतम बुद्ध भारत में कर चुके थे। उस दौर में भारत विद्या का बड़ा केन्द्र था, कुछ विद्वान यह कयास लगाते हैं कि ईसा मसीह भारत आए थे। गौर करने की बात है कि ईसा मसीह का 13 वर्ष की उम्र से 29 वर्ष की उम्र तक का विवरण कहीं मिलता नहीं है। वे अरब दुनिया में अचानक ही 30 वर्ष की आयु में प्रकट होते हैं और मसीहा हो जाते हैं। वे दया की बात करते हैं, वे प्रेम की बात करते हैं, जिसे वहां का तत्कालीन समाज स्वीकार नहीं करता। ईसा मसीह के विरुद्ध हिंसा होती है। ईसा मसीह का जीवन भारतीय संन्यासी की तरह का है, वे हंसते हुए कष्ट सहते हैं, जैसा कि बुद्ध भी करते थे। जाहिर है, बौद्ध धर्म ईसाइयों की बाइबिल के न्यू टेस्टामेंट के ज्यादा करीब नजर आता है।
हालांकि बाद में बाइबिल के हवाले से ही ईसाई धर्म में विकृतियां भी आईं, कर्मकांड भी बढ़े, जिसके कारण प्रोटेस्टेंट ईसाई की धारा निकली। प्रोटेस्टेंट ईसाई की धारा उसी बाइबिल को मानती है, जो हीब्रू या प्राचीन ग्रीक में लिखा गया है। बाइबिल पर आज भी शोध चिंतन जारी है, आज भी उसके नए-नए पहलू सबके सामने आते रहते हैं।