मुस्लिमों के मूल धर्म ग्रंथों को जानिए 

मुस्लिमों के मूल धर्म ग्रंथों को जानिए

अगाध

Hajj

दुनिया में जिस एक किताब को पूरी कड़ाई और श्रद्धा के साथ एक बहुत बड़ी जनसंख्या मानती है, वह है क़ुरआन। यह एक अरबी शब्द है, जिसका अर्थ है – बार-बार पढ़ा जाना या बार-बार पढ़ी जानेवाली किताब। क़ुरआन दुनिया में सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली वह प्राचीन किताब है, जिसमें इस्लाम वर्णित है। क़ुरआन को कोई चुनौती नहीं दे सकता। क़ुरआन ईश्वर की किताब है। दुनिया में शायद ही कोई ऐसा मुस्लिम होगा, जिसके पास या जिसके करीब यह किताब न हो। यह मुस्लिमों के घर-घर में बहुत पाक तरीके से रखी जाने वाली किताब है। इसको जब छुआ जाता है, तो हाथ और शरीर से साफ होना जरूरी है। इसे उठाना और पढऩा सम्मान की बात है। अच्छे मुस्लिम इस किताब के पास जाते ही शांत चित्त हो जाते हैं, क़ुरआन के साथ बिताया गया उनका समय सबसे पवित्र और सबसे यादगार होता है। क़ुरआन उन्हें अंदर-बाहर से सुकून देता है, वे इस किताब के साथ एकाकार होकर अल्लाह की इबादत करते हैं। मुस्लिम धर्म में पांच वक्त की जो नमाज होती है, उसमें क़ुरआन की ही आयतें पढ़ी जाती हैं। इस्लाम को मानने वाले दिल से इस बात को मानते हैं कि क़ुरआन को अल्लाह ने पूरी दुनिया के लिए जमीन पर उतारा। दूसरे धर्म के विद्वान भी इसे बहुत सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। यह एक ऐसी किताब है, जिसके बारे में यह माना जाता है कि इसके खिलाफ कुछ भी नहीं लिखा जा सकता। जो ज्ञान क़ुरआन में वर्णित है, वह किसी भी प्रकार की चुनौती से परे है। वहां केवल झुक जाना है, वहां केवल स्वीकार कर लेना है। स्वीकार से ही श्रद्धा भाव जागता है। प्रश्न तो काफिर बनाते हैं। तो कम से कम क़ुरआन के संदर्भ में प्रश्न अनुपयोगी हैं, व्यर्थ हैं। क़ुरआन पूरी मानव जाति को राह दिखाता है। इसके बताए रास्ते पर चलना भले मुश्किल हो, लेकिन एक सच्चा मुसलमान इसकी राह पर चलता है और अल्लाह को समर्पित हो जाता है। दुनिया में हजारों ऐसे लोग हैं, जिन्हें क़ुरआन पूरी तरह से याद है – ऐसे लोगों को हाफिज कहते हैं।
ऐसा माना जाता है कि चूंकि यह किताब मानव रचित नहीं है, इसलिए इसकी शैली भी अन्य मानव रचित किताबों जैसी नहीं है। यह किताब अल्लाह ने हजरत मोहम्मद साहब के जरिये दुनिया में उतारी। ऐसा माना जाता है कि देवदूत जिब्रेल से हजरत मोहम्मद साहब की पहली मुलाकात के साथ ही क़ुरआन का दुनिया में अवतरण शुरू हुआ। अल्लाह की इस किताब के अवतरण में लगभग 22 -23 साल लगे। यह किताब जब हजरत साहब के दिलो-दिमाग में आहिस्ता-आहिस्ता उतरती थी, तब वे अपने शिष्यों और लोगों के बीच इसका प्रवचन करते थे। एक से एक ज्ञान की बातें, एक से एक पवित्र दुनिया की बातें, एक से एक जीवन व्यवहार से जुड़ी बातें, एक से एक कर्म और धर्म से जुड़ी बातें। अल्लाह ने अपने पैगंबर हजरत मोहम्मद के जरिये दुनिया को राह दिखाई। जो लोग शैतान की राह पर भटक गए थे, जो लोग जुल्म-सितम और कोरी बुत परस्ती में लग गए थे, उन्हें राह पर लाने और यह याद दिलाने के लिए कि मैं एक ही हूं, दूसरा कोई नहीं है – अल्लाह ने क़ुरआन को उतारा।
हजरत मोहम्मद साहब का जीवन बहुत उथल-पुथल भरा था। उन्होंने अपने जीवन में खूब संघर्ष देखे, लड़ाइयां देखीं, मुकाम देखे। वे जहां भी जाते वहां अल्लाह की कृपा भी जाती और अल्लाह ही दया से हजरत साहब क़ुरआन की नई-नई आयतों को बोलते चलते-याद करते चलते, दूसरों को याद कराते चलते। कुछ आयतें मक्का में उतरीं, तो कुछ मदीना में तो कभी पैगंबर साहब के घर में तो कभी युद्ध के मैदान में। जब जैसा अवसर आया, तब तैसी ज्ञान की बातें उतरीं। शब्दावली भी बदली, कहने का अंदाज भी बदला और सम्बोधन भी बदले।

क़ुरआन का अवतरण और लेखन

ऐसा माना जाता है कि 22  दिसंबर 609 को क़ुरआन का अवतरण शुरू हुआ था। हालांकि कुछ लोगों के अनुसार, अगस्त 610 में रमजान के महीने में अवतरण शुरू हुआ। तब हजरत मोहम्मद साहब 40 वर्ष के थे। क़ुरआन के अवतरण के शुरू होते ही उनका जीवन भी पूरी तरह बदल गया। अगले 23 वर्ष तक वे क़ुरआन के अवतरण का माध्यम बने। उनके निधन ईस्वी सन 632 तक क़ुरआन का अवतरण पूरा हो चुका था, लेकिन क़ुरआन दुनिया को लिखित रूप में उपलब्ध कराने का काम पैगंबर साहब के निधन के साल भर बाद ही शुरू हुआ। ऐसा माना जाता है कि ईस्वी सन 653 में क़ुरआन मुकम्मल रूप में लिख ली गई और उसका प्रचार-प्रसार और तेजी से होने लगा। यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि क़ुरआन एक ऐसी किताब है, जिसमें वर्ष 653 के बाद से आज तक एक शब्द का भी हेरफेर नहीं हुआ है और न हो सकता है।

क़ुरआन लिखित स्वरूप में कैसे आया?

क़ुरआन की आयतों के संचयन में हजरत मोहम्मद साहब के करीबी शिष्य जैद इब्न साबित (जीवनकाल 615-660) की बड़ी भूमिका रही है। वे पैगंबर साहब के समय ही क़ुरआन के बड़े विद्वान प्रचारक माने जाते थे। उन्होंने क़ुरआन के एक बड़े हिस्से को संजोकर रखा था और मोहम्मद साहब के निधन के बाद उसे तत्कालीन खलीफा अबू बक्र (खलीफा रहे 632 से 634 तक) को सौंप दिया। इस्लाम में उथल-पुथल का दौर जारी रहा, इस्लाम का प्रचार भी तेजी से होता गया। खलीफा उस्मान इब्न (खलीफा रहे 644 से 656 तक) ने जब यह देखा कि क़ुरआन को लेकर अलग-अलग व्याख्याएं होने लगी हैं, तब उन्होंने क़ुरआन को एकरूपता देने के लिए फिर एक बार जैद इब्न साबित को याद किया और संचयन का काम फिर एक बार हुआ। अल्लाह की मर्जी से उसके बाद ही क़ुरआन का अंतिम लिखित स्वरूप सामने आया। ऐसा माना जाता है कि क़ुरआन में एक भी शब्द ऐसा नहीं है, जो अल्लाह का न हो, इसमें यहां तक कि पैगंबर साहब का भी एक भी अपना शब्द शामिल नहीं है।

हदीस अनेक हैं, लेकिन 6 हदीस प्रमुख हैं

हदीस को क़ुरआन के बाद इस्लाम में बहुत सम्मानित ग्रंथ के रूप में देखा जाता है। हदीस एक नहीं है, अनेक हैं। अनेक लोगों ने हदीस का संग्रह किया है। हदीस मोहम्मद साहब की कही बाते हैं या उनसे जुड़ी बातें हैं, उनके द्वारा दी गई व्यवस्थाएं हैं, उनके द्वारा दिए गए आदेश और उपदेश हैं। मुख्य रूप से छह हदीस संग्रहों को ज्यादा माना जाता है – जिनमें कुल 29578 हदीसें संकलित हैं। हदीसों की व्याख्या में इस्लाम धर्म में खूब ग्रंथ लिखे गए हैं और लिखे जा सकते हैं। ज्ञान-विज्ञान से लेकर लोक व्यवहार तक पैगंबर साहब के हवाले से बहुत कुछ ऐसा है, जो हदीस में हमें मिलता है और जिसकी पढ़ाई आज भी मदरसों में होती है। इस्लाम में बच्चों को हदीस पढ़ाया जाता है। क़ुरआन तो पाक है, अरबी है, कठिन भी है, जल्दी किसी को समझ में नहीं आता, लेकिन जब व्यक्ति धीरे-धीरे हदीस को पढ़ते हुए अपने जीवन में आजमाते हुए आगे बढ़ता है, तो उसे क़ुरआन का अर्थ समझ में आता है। इस्लाम को जानने के लिए हदीस को जानना भी जरूरी है। हदीस से ही इस्लामी दुनिया अपने लिए नियम-कायदे-कानून निकालती या सीखती आई है।