वो आए और २३ साल में बदल गए दुनिया

पैगंबर हजरत मुहम्मद का जन्मदिन मुबारक

मीलाद उन-नबी अर्थात बरावफात अर्थात हजरत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का जन्मदिन। यह दिन पूरे धूमधाम से उत्सव के साथ और पूरी खुशी-प्रार्थना के साथ अल्लाह को याद करने का पाक दिन है। दुनिया में इसलिए अल्लाह के दूत या पैगंबर मुहम्मद का जन्म हुआ था, ताकि दुनिया को नई राह दिखाई जा सके। इस दुनिया में, जो विभिन्न विचारों, भ्रमों में भटक रही थी, पहले से पता था कि एक अवतार होगा और हजरत मुहम्मद के रूप में दुनिया को वह फरिश्ता मिला, जिसने दुनिया के एक बड़े हिस्से को बदलकर रख दिया। एक ऐसा विचार दुनिया को मिला, जो आज भी दुनिया में मुख्य धारा का विचार है, जिसकी समकालीनता या जिस पर चर्चा कभी रुकती नहीं है।हजरत मुहम्मद का जन्म ९ रबीउल अव्वल ५३ हिजरी पूर्व (२० अप्रैल ५७१) को मक्का शहर में हुआ था। पिता हजरत अब्दुल्लाह पुत्र के जन्म से पहले ही अल्लाह के यहां बुला लिए गए थे। जब हजरत छह वर्ष के हुए, तो माता हजरत आमना का भी साया सिर से उठ गया। दो साल के हुए तो दादा अब्दुल मुत्तलिब नहीं रहे। चाचा अबू तालिब ने आपको पाला। हजरत का जीवन बहुत संघर्षमय बीता, लेकिन उन्होंने अच्छाई की राह को नहीं छोड़ा। चचाजान के साथ व्यापार में लगे रहे। जब आपको पैगंबर होने का संदेश नहीं मिला था, तब भी आप सत्यवादी थे और लोगों के बीच अच्छे इंसान के रूप में आपकी पहचान थी। आपने २५ वर्ष की आयु में एक नेक और सम्मानित ४० वर्षीय विधवा हजरत खदीजा के साथ निकाह किया। हजरत मुहम्मद जब ४० वर्ष के हुए, तब फरिश्ते जिबरील ने आपको पैगंबर होने की सूचना दी। आपका जीवन बिल्कुल बदल गया। पाक कुरान का अवतरण शुरू हुआ।हजरत मुहम्मद पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन उन्हें अल्लाह की रहमत से ज्ञान हासिल हो गया। उन्होंने सबसे पहले अपने करीबियों को अल्लाह का पैगाम सुनाया, ‘बुतों की पूजा छोडक़र एक ईश्वर की उपासना और बन्दगी करो, उसके अतिरिक्त कोई उपास्य नहीं और मैं ईश्वर का दूत हूं।’

सबसे पहले कौन हुए मुसलमान ?

सबसे पहले आपकी पत्नी हजरत खदीजा, चचेरे भाई हजरत अली, मित्र अबू बक्र और दास हजरत जैद ने इस्लाम कुबूल किया। कहा जाता है कि जिसे आज ईश्वर का घर काबा कहा जाता है, ठीक उसी जगह कभी ३६० बुतों की पूजा होने लगी थी, लेकिन इस्लाम का पैगाम फैलना शुरू हुआ, तो बुतपरस्ती को जवाब मिला। लोगों ने दुनिया के मालिक के निराकार स्वरूप का महत्व समझा। नबी हजरत मुहम्मद को युद्ध भी करने पड़े, उन्हें मारने, सताने और दबाने की भी बहुत कोशिशें हुईं, लेकिन इस्लाम का झंडा बुलंद रहा। अंतत: लड़ाइयों में उलझे मक्का और मदीना में शांति बहाल हुई। एकेश्वरवाद को बहुत बल मिला। ख्याति ऐसी फैली कि लगभग पूरा अरब आपकी एक आवाज पर जान देने को तैयार हो गया। आपको इसलाम की सेवा के लिए महज २३ साल मिले थे, लेकिन आपने कमाल कर दिया। अपने आखिरी हज के बाद नबी मदीना आ गए और ६३ की उम्र में १२ रबीउल अव्वल ११ हिजरी (११ जून ६३२) को अल्लाह ने आपको बुला लिया। वे दुनिया में अब तक के आखिरी पैगंबर हैं। उनके बाद कोई पैगंबर नहीं आया है।

वो जगहें, जो पैगंबर की याद दिलाती हैं

मक्का के काबा में स्थित मस्जिद उल हरम वही स्थान है, जहां पैगंबर हजरत मुहम्मद साहब ने पहली बार इस्लाम का ज्ञान प्रदान किया। मदीना में स्थित मस्जिद उन नबवी वह जगह है, जहां पैगंबर हजरत मुहम्मद अंतिम विश्राम को गए। मक्का में घर-ए-हीरा नाम की एक गुफा भी है, जहां हजरत आया करते थे और यहीं उनकी मुलाकात देवदूत जिबरिल से हुई थी। जिबरिल ने ही उन्हें संदेश दिया था कि अल्लाह ने अपने पैगंबर के रूप में हजरत का चयन किया है। कुरान की कुछ आयतें यहीं उतरी थीं। पैगंबर से जुड़ी और भी जगहें हैं, लेकिन उन सबमें उपरोक्त तीन का स्थान सर्वोपरि है।

पैगंबर ने जो दुनिया को सिखाया

– उलझो मत, ईश्वर को समझो, वह एक ही है, दूसरा कोई नहीं।- हठ करो, काम में लगे रहो, अपनी सफलता तक हार नहीं मानो।- मुश्किलों से न डरो, गलतियों से सीखो, तैयारी से लड़ो और जीतो।- कोशिश करो कि अधिक से अधिक लोग तुम्हारे साथ मिलें-चलें।- अल्लाह देख रहा है, हिसाब लेगा, तुम सच्चाई की राह न छोड़ो।- गरीबों और जरूरतमंदों को न सताओ और दुश्मनों को नहीं छोड़ो।- जैसे ज्ञान शक्ति जरूरी है, वैसे ही तलवार शक्ति भी जरूरी है।- अपनी पवित्रता को बरकरार रखो और न्यायपूर्ण समाज बनाओ।- ज्यादा तर्क मत करोगे, उलझ जाओगे। अल्लाह का पैगाम मानो।- तुम्हारे विचार सही हैं, तुम सही हो, कहीं रुको मत, फैल जाओ।- कभी निराश न हो, अल्लाह पर विश्वास रखो, वही राह दिखाएगा।