हिन्दुओं के मूल धर्म ग्रंथों के बारे में जानिए

हिन्दुओं के मूल धर्म ग्रंथों के बारे में जानिए

अगाध

HINDUISM

हिन्दू धर्म के आधार में वेद हैं। चार वेद हैं – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद। वेदों में कुल 23,479  मंत्र शामिल हैं। श्लोक देखें, तो चारों वेदों में करीब 4,00,000 श्लोक हैं।
 
 

ऋग्वेद में 10440 मंत्र, यजुर्वेद में 5177 मंत्र, सामवेद में 1875 मंच, अथर्ववेद में 5987 मंत्र हैं। इसके अलावा कुछ लोग पंचम वेद महाभारत को मानते हैं – जिसमें कुल 17,00,000 श्लोक हैं। वेदों को जगतपिता ईश्वर ने ही प्रकट किया है। वेद मंत्रों को श्रुति भी कहते हैं, क्योंकि पहले के समय में एक दूसरे से सुनकर ही मंत्रों का ज्ञान होता था। वैदिक ऋषि महर्षि वेदव्यास ने इन वेदों का संपादन किया। हालांकि कुछ अध्ययनों में यह कयास भी लगाया जाता है कि वेदव्यास कोई एक विद्वान ऋषि नहीं थे, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी ऋषियों का समूह था, जिसे वेदव्यास नाम से जाना गया।


वेदों में क्या है?

वेदों में समस्त देवों की अर्थपूर्ण आराधना की गई है। इसके साथ ही प्रकृति के तहत आने वाले नाना प्रकार के ज्ञान व गुणों का वर्णन भी किया गया है। वेद मनुष्यों को जीने की कला सिखाते हैं, वेदों को ज्ञान का खजाना माना जाता है। वेदों को समझना और समझाना आज भी कठिन माना जाता है, दुनिया का शायद ही कोई ऐसा विद्वान या संत है, जो वेदों के बारे में नहीं जानता। उदाहरण के लिए, पैगंबर मोहम्मद साहब ने वेदों और भारत के ज्ञान की ओर काबिलेगौर इशारा करते हुए कहा था कि मुझे पूरब से इल्म की हवा आती महसूस होती है। पूरब में भारत ही था, जहां अरब, यूरोप, चीन से भी छात्र पढऩे आते थे।

हिन्दू संस्कृति या सनातन संस्कृति को जानने के लिए वेदों को जानना जरूरी है। धर्मशास्त्र का इतिहास लिखने वाले भारत रत्न विद्वान डॉ. पी.वी. काणे के अनुसार, वैदिक रचनाओं का काल ४००० वर्ष ईसा पूर्व का रहा है। हालांकि अन्य विद्वान भी हैं, जो वेदों को और भी प्राचीन मानते हैं। किन्तु इतना तय है कि वेद संसार में सबसे पुरानी धार्मिक रचना हैं। इन्हीं के आधार पर हिन्दू धर्म को सनातन या या सबसे पुराना धर्म माना जाता है।


कई हिन्दू ग्रंथ नष्ट हो गए

ऐसा माना जाता है कि वेदों का एक बड़ा भाग आज भी संकलित नहीं है। भारत चूंकि समय-समय पर आक्रमणों का शिकार होता रहा, इसलिए बड़ी मात्रा में ग्रंथ नष्ट हुए हैं। जब भारत में छपाई की व्यवस्था नहीं थी, तब ग्रंथों का संचय बहुत मुश्किल काम था, उस दौर में जो हमले हुए, भारत के प्राचीन विश्वविद्यालयों जैसे नालंदा को जिस तरह से नष्ट किया गया, उसके कारण भारत या हिन्दू धर्म का बहुत सारा ज्ञान खो गया। आधुनिक दौर में कागज के आविष्कार और छपाई की सुविधा के बावजूद आज भी अनेक ग्रंथ भारत में लोगों के पास घरों में उपलब्ध हैं, जिनका प्रकाशन नहीं हो पाया है।
वाल्मीकि रामायण और महाभारत

सहज भाव से कहें, तो वेदों को समझने के लिए हमें वाल्मीकि रामायण और महाभारत का अध्ययन करना पड़ता है। ये दोनों ग्रंथ इतिहास माने गए हैं। इन दोनों ग्रंथों में वेदों का ही ज्ञान इस तरह से प्रस्तुत है कि सभी को उदाहरण के साथ सहजता से समझ में आ जाए। ऋषि जानते थे कि वेद का पाठ हर कोई नहीं कर पाएगा, इसलिए उन्होंने इतिहास के रूप में रामायण और महाभारत की रचना की, ताकि आम लोग भी कथा के माध्यम से ज्ञान प्राप्त कर सकें।


18 पुराण – जिनका पाठ होता है

हिन्दू धर्म में 18  पुराण मान्य हैं। पुराणों में भी कथाएं भरी पड़ी हैं और साथ ही वेदों से निकला ज्ञान भी है। पुराणों का पाठ भारत में सहजता के साथ किया जाता है। शिव पुराण, श्रीमद्भागवत पुराण, विष्णु पुराण, ब्रम्हपुराण, गरुण पुराण इत्यादि का पाठ ज्यादा होता है। इसके अलावा पद्म पुराण, नारद पुराण, मार्कण्डेय पुराण, अग्नि पुराण, भविष्य पुराण, ब्रम्हवैवर्त पुराण, लिंग पुराण, वराह पुराण, स्कन्द पुराण, वामन पुराण, कूर्म पुराण, मत्स्य पुराण, ब्रम्हाण्ड पुराण। पुराणों को भगवान का अंग माना गया है। जैसे ब्रम्ह पुराण को भगवान सिर और पद्मपुराण को भगवान का हृदय माना गया है। सबसे बड़े पुराण शिव पुराण में करीब १ लाख श्लोक हैं, जबकि वामन और कूर्म पुराण 6000 -6000 श्लोकों के साथ सबसे छोटे पुराण हैं। इन पुराणों के अलावा करीब 60 उपपुराण भी हैं, जिनका हिन्दू धर्म में महत्व है।


हिन्दू धर्म के 108 उपनिषद

उपनिषद का अर्थ है – पास बैठना। ब्रह्म, ज्ञान के पास बैठना। उपनिषद वास्तव में वेदों का ही विस्तार हैं। ये हिन्दू संस्कृति में ज्ञान का कोश माने जाते हैं। भारतीय दर्शन का आधार उपनिषदों से ही खड़ा होता है। असंख्य उपनिषद हैं, लेकिन मोटे तौर पर उन्हें 108 माना गया है। भारतीय ऋषि जो ज्ञान चर्चा करते थे, उसका सार उपनिषदों में उपस्थित है। उपनिषदों में लाखों प्रश्नों के उत्तर छिपे हैं। जीव जगत कहां से आता है, कहां रहता है और कहां जाएगा, मनुष्य क्या है, शक्ति क्या है, देव क्या हैं, ईश्वर क्या है, इत्यादि लाखों प्रश्नों के उत्तर उपनिषदों में मिलते हैं। भारतीय विद्वान समय-समय पर उपनिषदों पर भाष्य लिखते रहते हैं। उपनिषदों की व्याख्या की भारत में परंपरा है। वेद और उपनिषदों की यह खूबसूरती है कि ये किसी को भी चिंतन से रोकते नहीं हैं, ये यह मानकर चलते हैं कि उनकी व्यक्ति दर व्यक्ति अलग-अलग व्याख्या संभव है। हर विद्वान व संत अपने-अपने भाव के अनुरूप व्याख्या प्रस्तुत कर सकता है।


हिन्दू धर्म में कोई ग्रंथ अंतिम नहीं

हिन्दू धर्म दूसरे धर्मों से अलग है। जैसे ईसाई या इस्लाम के अपने-अपने मूल धर्म ग्रंथ हैं, वहीं हिन्दू धर्म का कोई एक मूल ग्रंथ नहीं है। अनेक ग्रंथों में हिन्दू या सनातन धर्म का ज्ञान बिखरा हुआ है। वेदों को प्राचीन माना जाता है, हालांकि उन्हें भी चुनौती दी जा सकती है। स्वयं भारत में वेदों को चुनौती दी गई है। भारतीय ज्ञान क्षेत्र अपनी अब तक रची किसी भी किताब को अंतिम नहीं मानता। यहां जीवन, ज्ञान, ब्रह्म – कुछ भी अंतिम नहीं है। यहां धर्म ग्रंथ लिखने की अभी भी खूब संभावना है। हां, यह जरूर है कि यह ग्रंथ भारतीय ज्ञान परंपरा – वेद-पुराण-उपनिषद के अनुरूप होना चाहिए। हिन्दू धर्म के नाम पर बहुत कुछ अनर्गल भी लिखा गया है, कई पुस्तकें हैं, जिनको हिन्दू समाज ने कूड़े के ढेर में डाल दिया। यहां धर्म के नाम पर इतना कुछ अच्छा लिखा जा चुका है कि यहां हल्का लिखकर धर्म के क्षेत्र में टिका नहीं जा सकता। यहां धर्म पर लिखी गई कोई भी रचना तभी टिक पाती है, जो गुणवत्ता में हर तरह से उच्च कोटि की होती है। ज्ञान एक ऐसी दशा या दिशा है, जिसमें अनंत तक चलते जाना है। उसकी सीमा कहीं खत्म नहीं होती। मनुष्य अपने जीवन में सीमित शक्ति और बुद्धि से धर्म का एक हिस्सा ही समझ पाता है। ज्ञान में भी अनेक मार्ग हैं, किसी भी मार्ग को पकडक़र ज्ञानी लोग मोक्ष या मुक्ति को प्राप्त करते हैं। धर्म के सारे मार्गों को जानना जरूरी नहीं है, किसी भी एक मार्ग को थामकर भक्तिभाव से लक्ष्य तक या परम सत्य या परम शांति या परम ज्ञान तक या परम ईश्वर तक पहुंचा जा सकता है।